Kiratarjuniyam Pratham Sarg (किरातार्जुनीयम् प्रथम सर्गः)

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Dr. Acharya Dhurandar Pandey - Sanskrit - Hindi (Translation)

Kiratarjuniyam Pratham Sarg (किरातार्जुनीयम् प्रथम सर्गः)

किरातार्जुनीयम् प्रथम सर्गः (Kiratarjuniyam Pratham Sarg) किरातार्जुनीयं महाकाव्य के रचयिता महाकवि भारवि जिस प्रकार अलङ्कारों का वर्णन करने में निपुण हैं उसी प्रकार वे छन्दों का वर्णन करने में भी कुशल हैं। छन्दों का प्रयोग करेन का आपका ज्ञान नितान्त प्रौढ है। आपने अपने महाकाव्य में अनेक अप्रचलित एवं कठिन छन्दों का अत्यन्त कुशलतापूर्वक प्रयोग करके अपने अवर्णनीय शास्त्रीय ज्ञान का परिचय दिया है जो कि एक सच्चे अध्ययनशील ज्ञानार्जन के इच्छुक का कार्य होता है।
                            महाकवि भारवि ने जहाँ वंशस्थ, उपेन्द्रवज्रा, उपजाति, द्रुतविलम्बित, पुष्पिताग्रा, मालिनी, प्रहर्षिणी आदि अप्रचलित छन्दों का प्रयोग किया है वहीं मत्तमयूर, औपच्छन्दसिक, अपरवक्त्रादि अप्रचलित छन्दों का भी प्रयोग किया है। विभिन्न प्रकार के इन छन्दों को देखने के बाद तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि महाकवि का कोई सर्वाधिक प्रिय छन्द है तो वह है वंशस्थ। क्योंकि आपने महाकाव्य का लगभग छठा भाग इसी वंशस्थ छन्द में निबद्ध किया है। महाकवि ने इसका सर्वाधिक प्रयोग प्रथम, चतुर्थ एवं चतुर्दश सर्गों में किया है।

Author : Dr. Acharya Dhurandar Pandey

Publication : Bharatiya Vidya Sanskthan

Language : Sanskrit - Hindi (Translation)

Edition : 2021

Pages : 146

Cover : Paper Back

ISBN :      -

Size : 14 x 2 x 21 ( l x w x h )

Weight : 

Item Code : BVS 0085

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